संदेश

तुमने कभी सोचा सूखे तपे पहाड़ों का दुःख

    मेरे जिस्म से निकलने वाली नदियों समय के क्रूर पत्थरों अस्मिता की अँधेरी गलियों में भटकने वाली दलित आत्माओं बाहर निकलो   उन्होंने हमें सच का प्रलोभन दिया है छीना है हमारा स्वत्व, हमारा घर, हमारे हरे-भरे खेत   हमारे लहू में नमक की मात्रा बढ़ा दी है गला दी हैं हमारी कमजोर अस्थियाँ   सिर्फ मौत का समझौता करते हुए बेच दिया है रोटी का एक टुकड़ा बेटी के लिए रोटी का वही टुकड़ा मेरे जीवन का अंतिम उद्देश्य हो गया है   हमने कभी नहीं सोचा प्रेम में नयापन कभी सौन्दर्यबोध की कविता नहीं रची भाषा में ऊंट की पीठ पर कविता लिखते हुए गुलाब के दावे को सुर्ख किया है हमने हम अपनी बदबूदार गलियों में भटकते रहे हैं दर-दर करते रहे हैं माई-बाप   हम असंतुष्ट कभी नहीं रहे धर्म और अहिंसा के पेंडुलम में भकाते हुए तुमने भेज दिया घर में शमशानी शांति तुमने हमारा मरणभोज खाया है पीढ़ियों से जूठन खिलाया फेंका हुआ   नए सूरज का उदय हुआ है पूरब में हम राजा से मांग रहे हैं अपनी खोई हुई मुहरें   यह अस्मिता या अस्...

ओ दलित बेटियों

ओ दलित बेटियों ओ सांवली धरती दो उभारों के बीच चलने वाली तुम्हारी नर्म सांसे पछाह धान का चिउरा कूटती जवान लडकियों की साँसों से थोड़ा तेज धड़क रही हैं तुम्हारी चौहद्दी के भीतर कुछ युवा लड़के कर रहें हैं तुम्हारी रखवाली मासूम कल्पना वाले देश में तुम्हारे लिए खरीद रहें हैं सिगार-पटार जुटा रहें हैं दूसरे साधन एक तुम हो अनुभूतियों के आकाश में दही जमा रही हो मद्धम हवा सी लहरा रही हो फुनगियों पर ओढ़नी नथुनी पर नचा रही हो गोल-गोल चाहतें तुम असुरक्षा का कवच ओढ़े घूम रही हो नंगी सड़कों, खुले बाजारों, बंद गलियों भीतर   बहेलिये के जाल को नाखूनों से काट रही हो वह जाल जो तुम्हें जिन्दा रखता तो है जीने का आकाश नहीं देता दूसरी परंपरा की खोज में तुम वर्जनाएं तोड़ रही हो तुम टूट रही हो वर्जनाओ सी तुम दूधो नहाओ पूतो फलो की उतरन उतार रही हो संस्कार से चिढ़-रूठ रही हो भीतर-भीतर एक अभ्र दमक रहा है माथे पर क्या-क्या कर रही हो आजकल  तुमने कभी सोचा सूखे तपे पहाड़ों का दुःख मेरे जिस्म से निकलने वाली नदियों समय के क्रू...
सपनों के जुलाहे चमर जुलाहों की यंत्राश्रित / पनियाई आँखों में अब नहीं उतरता ताना बाना सूख गए हैं स्रोत रो रही है गाभिन नदियाँ महाजनों की कारस्तानी बीते दिन की बात हो गई शोर मचने वाली मशीने खामोश रखती हैं उन्हें आज भी गुप्तचर के दरोगा बताते हैं जी रहें हैं वे सपने बुनते हुए.                   पिता यह मैं जानता हूँ की अभाव की पीड़ा में पथराये पिता/ तुम्हारे सपने /कुंठित नहीं थे और न ही थे मुरझाये हुए / कि दूबघास की तरह अंखुआते बरसात आने पर तुमने अपने लहू से / गढ़ी थी एक इबारत एक फलसफे को इंकार किया था / जो बोझिल करता था   पर तमाम उम्र तक / उम्मीद से नहाई तुम्हारी आँखों ने आखिर किया ही क्या था बकौल उनके   तुम जीते रहे बगैर उनकी परवाह किये जबकि तुम जानते थे की वो जरुरी था   आज अभाव से जूझते तुम्हारी नाउम्मीद आँखों में वे सपने हरे नहीं / हरे हैं तो / जवानी के वे दिन जिन्हें तुम बताते हो / न सुननेवाले को भी सुन...