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डरो नहीं ! मेरी कविता तुम्हारे खिलाफ नहीं है

डरो नहीं ! मेरी कविता तुम्हारे खिलाफ नहीं है आवेश में अक्सर धमकियों भरे ख़त हम भी लिखते हैं किसी आतंकवादी समूह की तरह नहीं  मिट्टी में बंद बारूदी सुरंग की तरह  जिन्दगी की जंग लड़ते-लड़ते बंद मुट्ठी में भीगे हुए ख़त अचानक स्याह हो जाते हैं  उस दोराहे पर जहाँ पहलवानछाप बीड़ी का धुवां मेरी धमनियों में फैल जाता है और मुझे सांस लेने में दिक्कत होती है मैं कहता हूँ डाक्टर मुझे दिक्कत हो रही है  तुम कहते हो सब ठीक हो जाएगा  जहाँ मेरे बच्चे को खून की उल्टियाँ होती हैं  और मेरी मासूम बेटी किसी गुमनाम सिपाही की माँ बनती है तुम कहते हो सब ठीक हो जाएगा  जब मैंने हथियार उठाया तब मेरी उम्र बहुत छोटी थी  अक्सर हमें बताया जाता था हमने बहुत दुःख झेला है  अपनी जमीन से बेघर होने से पहले हम सुखी थे  बीच-बीच में तुम्हारे मध्यस्थ आते रहे हैं  पर उन्होंने समझौते के बदले हमें दुबारा बिखेर दिया  जिस कलम ने हमारे विकास का सपना लिखा था  समय के साथ उसकी स्याही सूख गई  हमारे लिए लिखवाए गए विकास सेना की बंदूकों में कैद हो गए  क्या आप जानत...

मैं मनुवादी होना चाहता हूँ

मैं मनुवादी होना चाहता हूँ कोई इस सुन्दर विषय पर लिखना ही नहीं चाहता. इस विषय की प्रासंगिकता ब्राम्हण काल से लगातार बनी हुई है. अब तो ज्यादा ही प्रासंगिक है क्योंकि दलित-आदिवासी साहित्य आजकल उभार पर है. ऱोज ही नई-नई दलित आत्मकथाएं लिखी जा रहीं हैं. हिंदी में तो जातीय साहित्य भरा पड़ा है. लेखक अपनी जाति को दिमाग में रखकर किताबें लिखता है.आप पूरा हिंदी साहित्य पढ़ लें. सब एक ही जाति ने लिखा है. हालाँकि अपवाद तो सब जगह होते हैं.  मैंने सोचा एक मैं ही होनहार विरवान हूँ चलो हवा में तीर उछालता हूँ क्या पता कुछ टपक ही पड़े तथापि सावधानी बरतनी भी जरुरी है अतः उल्टी कलम से लिख रहा हूँ. पता चला लेने के देने पड़ गए. फिर भी इसे मैं पवित्र पाप की तरह ही ले रहा हूँ. उस कटेगरी के लोग इसे न पढ़े जिनका आगे जिक्र आया है. जिसका कभी ह्रदय का आपरेशन हुआ हो, सेक्युलर होने की बीमारी हो, अपनी जाति से स्वाभाविक घृणा हो या कभी भी जातिदंश न झेला हो, समाज से जिनका बेहतर तालमेल ना हो. ऐसी ही नेकसलाह कमजोर दिल किन्तु सुंदर स्त्रियों को भी दी जाती है हालाँकि यह मेरी व्यक्तिगत सलाह न समझी जाए क्योंकि ...

डरी हुई चिड़िया का मुकदमा

डरी हुई चिड़िया का मुकदमा एक : एक डरी हुई चिड़िया पिंजरे में बंद है खूनी पंजों से बाहर कैसे जायेगी तम्बाकू मलते हुए है तोंदू दरोगा ठकुरई अंदाज में अपनी भाषा में सिपाही को समझाता है क्या तुम जानते हो दो-दो पांच कैसे होते हैं सिपाही अपनी सूड़ हिला देता है हिंदी की रीतिकालीन कविता की तरह वह प्रत्येक अंग की शालीन सफाई करता है जैसे सब लोग करते हैं मौका पाकर   एक ही सांस में सारी बातें मात्रिक छंदों में समझा देता है जैसे समझाता है नाई का उस्तरा   वकील बन मुकदमे से पहले का हार समझाता है भय, भूख, भ्रष्टाचार की दुहाई देता है, बताता है जीवन के लम्बे अनुभव “बड़का बाबू का किहे रहिन ओकरा साथे सब जानत हैं”    पंडित बन धर्म की दुहाई देता है, लाभ लोभ समझाता है बस अब राम नाम लो जो कुछ हुआ सब भूल जाओ बताता है इस करनी का फल वहां मिलेगा जहाँ केवल देवता रहते हैं   न्यायालय में क्या तेरा बाप बैठा है जो फाइल ढूंढेगा   पूरे मुकदमे का बहीखाता बताता है बन महाजन माँ-बहिन की आरती उतारता हुआ बुदबुदाता है अधूरी जांच लटक जा...

नाचो न इजाडोरा

आज आठ मार्च है. यानी कि महिला दिवस.उन्हीं लोगों केलिए लिखी गई एक कविता ............... नाचो न इजाडोरा जिस धुन की तलाश में निकले हैं हम उस धुन की थाप पर गोल दुनिया रोज मिलती है हर चीज बेधते हुए एक नई सुबह होने से पहले जैसे घुंघुरुओं से मिलती है तुम्हारी आवाज ओहान पामुक तुम्हारे लिए लिखते हैं विनयपत्र तुम्हारे प्रेम में खोये किसी प्रेमी की तरह बेअदब किसी धर्म के लिबास में लिपटे हुए पत्र तुम्हे बहुत अंदर तक ख़ुशी देते हैं तुम धरती की तरह स्वभावतः नाचती हो जैसे साइबेरिया के परिंदे नाचते हैं बेखबर किसी रानी के सुंदर हाथों पर जैसे नाचते हैं चूड़ीवाले के हाथ स्पर्श की कामना से भरे हुए नुमायशी कोठियों के सर्द कुहरे तुम्हारी आह पर काँप जाते हैं तुम्हारी नर्म देह की थिरकन रुकने का नाम नहीं लेती तुम्हारा वर्तमान मुरझाए फूल की तरह खिला है जिस दिन तुम्हारी थाप रुक जायेगी धरती की सारी दूबें जल कर राख हो जायेंगी इस देश की लड़कियां तुम सा मोम होना चाहती हैं बाजारू क्रीम की घोषणा के बावजूद फटी हुई एडियाँ सहलाती हुई वे कल्पना की तरह उड़ना चाहती हैं किसी गुप्त आकाश में जहा...

बड़ी उम्मीद से लिख रहा हूँ मैं

    उसकी भी गुजारिश जिसे तुमने अचानक मना कर दिया गिलहरियाँ जिनको तुम्हारे साहचर्य से जीना था   उसे जिसे देख अनचाहे मुड़ गए तुम्हारे कदम उसकी जिसकी आँखे उम्मीद से लाल हो गईं वह जिसका कोई नहीं है तुम जानते हो जिसका भेड़िया प्रश्न तुम्हारे आगे दुम हिलाता रहा   सदियों का संताप झेलनेवाले गूंगों की भाषा बोलनेवाले पपीहे जूठन खाने वाले जानवर   तुम्हारे जूते की मरम्मत करनेवाला मोची तुम्हारे गाड़ी पर पोंछा लगाने वाला लड़का तुम्हारे बेटियों को स्कूल ले जाने वाला रिक्शा   जिन्हें संसद की भाषा में लिखना था इतिहास अनचाहे संविधान पर कर दिए हस्ताक्षर   वे सभी जो दलित वंचित पिछड़े हैं जिनकी निगाहें इलाज का सपना तोड़ रहीं हैं जो सर्दियों की रात में तारों से ताश खेलते हैं   जिनकी निगाहों में शिक्षा की सुई गोल घूमती है सफ़ेद ग्लोब में जिनका घर नजर नहीं आता   पांचसाला जादू जिनके आँचल में दम तोड़ देता है   तुम्हारे आसपास की प्रकृति, संरचना, बनावट, बुनावट ठेले पर हिमालय बे...

मेरे ह्रदय में तुम्हारी प्रार्थना जीवित है

    छोटे छोटे दुखों से हरी-भरी रातें चहलकदमी करते दरवेश से तुम आस्था का कुम्भ नहाकर लौटी मेरी देह गुम हुई अर्थ की तलाश में गई मेरी आत्मा और शायद वह कुछ जो बचा है मेरे भीतर तुम्हें आवाज देते हैं     वह आवाजें जो बधिया नहीं सकतीं वे विचार जिनके डूबने से गुडुप की आवाज होती है वह सपने जिनके मरने से हम मरते नहीं हैं पर हार जाते हैं बिना लड़े युद्ध तुम्हारा दिया हुआ बहुत कुछ है इस काया भीतर जो इन सूखी अस्थियों को आधार देता है   अनगिनत रातों तक जागता हुआ मैं उनीदा सोया रहा हूँ अनागत सेज पर बैठी हुई मेरी देह बतियाती रही है ताउम्र तुमसे कुछ था जिसे कहने के लिए बादल आते रहे थे और जब बरसे थे तो भीतर तक भीग गया था मैं   बरक्श कुछ चीजें हैं, तुम्हारी पवित्र किताब में दर्ज मैंने छूने का साहस नहीं किया तुम सा बनने की बहुत कोशिश की मैंने पर असफलता ने मेहनत करने की सीख दी और कहा मैं तुम्हारे इशारे पर चलूँ   धूप तुम्हारे अच्छे के लिए है कहा था एक दिन तुमने, मैंने धूप को धूनी बना...

अयोध्या और मगहर के बीच

अयोध्या और मगहर के बीच फैली है एक काली रेखा शुष्क किन्तु बजबजाती हुई जैसी वैचारिक दूरी है मड़ई चमार और सुरजन पांडे के अहाते बीच घिन और बदबू से सराबोर दोनों की संस्कृतियों और सपनों में बुद्धिजीवियों सा तेवर दोनों की कूट रेखाओं को पढ़ती हैं क्रूर सरकारें समय और सन्दर्भ के अनुसार सूखते फफोले और लपटों में जलती जिन्दा देहों की तरह राजनीति ... करवट बैठती है अयोध्या में प्रधानमंत्री का जुमला छोड़ता राजाओं के पासे में अयोध्या फिर-फिर प्रासंगिक रहा है चुनाओं के आने तक, चुनाओं के बाद निरीहों को फासी तक ले जाता हुआ शहर को शवदाह बनता हुआ, खुद पर थूकता हुआ पत्थरों में कैद रामलला, समझते हैं राजनीति का व्याकरण रोते हैं कभी-कभी अपने कृत कर्मों पर बूढी आस्थाओं के डूब जाने से पहले थरथराती है दीपक की लौ भीत एवं मद्धम दूरियों को पाटने वाली राहें, पोंछती है पसीना थके हुए पथिक डरते हुए भागते हैं छांह बरसाती धूप के लिए ढूढ़ते हुए आसरा डुगडुगी वाले बजाते हैं रौनक सुखी हैं अयोध्यावासी खबर फैली है जाखन मुहल्ले में अयोध्या के घाटों पर सर्कस करते पंडों की ध्वनि गूंजती है काया का मार्...