समकालीन हिंदी आलोचना के स्त्री स्वर/ डॉ. कर्मानंद आर्य/ Dr. Karmanand Arya
इक्कीसवीं सदी संक्रमण के दौर से गुजर रही है. भारतीय समाज में पहले आधुनिकता और फिर उत्तरआधुनिकता को लेकर काफी बहस मुबाहिसा हो चुका है. विमर्शों का जन्म कहीं इसी कोख से हुआ है. विमर्श चाहे वह किसी भी तरह का हो अब लगातार अपनी धुरी प्राप्त कर रहा है. समय का सातत्य यह है कि चाहे साहित्य हो अथवा समाज चारो तरफ उथल पुथल मच रही है. यही कारण है कि आधुनिक भारतीय समाज अब ज्यादा प्रजातान्त्रिक और लोक उन्मुख हुआ है. सबको अपना हक मिल पा रहा है और लोग बिना झिझक के खुद सबके सामने ला पा रहे हैं. ‘सिगमण्ड फ्रायड का यह बयान मशहूर है कि मनोविश्लेषण के क्षेत्र में इतने वर्ष काम करने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया कि स्त्री आखिर चाहती क्या है?’ [1] शायद इसीलिए स्त्री को ‘अंतिम उपनिवेश’ कहा गया है. स्त्री के लिए जो भी जगह छोड़ी गई है उसका वृतांत निश्चय ही कारुणिक है. लेकिन यह वृतांत हमेशा डराने वाला नहीं होना चाहिए. नहीं तो स्त्री अपनी वाजिब जगह ढूंढने से हमेशा खौफ खाती रहेंगी.’ [2] साहित्य के बिना समाज और समाज के बिना साहित्य की कल्पना असंभव है. समाज एक सामूहिक इकाई है और साहित्य भी बहुत सारी इकाइय...