समकालीन विमर्श : युवा दृष्टि और दलित लेखन *डॉ. कर्मानंद आर्य हिंदी दलित साहित्य का विधिवत सूत्रपात अस्सी के दशक में मराठी के प्रभाव से हुआ. हमारे यहाँ जिस नवजागरण, पुनर्जागरण की बात की जाती है वह एक पक्षीय था और उसमें एक बड़े वर्ग की हिस्सेदारी नगण्य थी. आजादी के बाद उपजी बंदरबांट में गरीब और गरीब होता गया, रही-सही कमी उदारीकरण और भूमंडलीकरण ने पूरी कर दी. वस्तुतः आज के इस दौर में सारे गरीब मुल्क दलितों की तरह इसके शिकार हैं. भूमंडलीकरण के इस दौर में सारा संसार एक गाँव होता जा रहा है. इसी का परिणाम है की विगत दशकों में दलितों में अस्मिता बोध जगा है. शिक्षा के कारण दलितों के आत्मविश्वास में इजाफ़ा हुआ है. समकालीन दलित विमर्श उसी की उपज है. दलित साहित्यकार एवं दलित आदिवासी साहित्य की उन्नायक रमणिका गुप्ता ने कहा है कि “ दलित साहित्य का ही भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि वह देवता और भगवान् नहीं, मनुष्य की बात करता है. [1] समकालीन दलित लेखन व्यापक परिवर्तनकारी उद्देश्यों को लेकर चल रहा है वह जहाँ समाज में सकारात्मक परिवर्तन करना चाहता है वहीँ पर वर्चश्ववादी अपसंस्कृति को उखाड़ फेक...
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..................................................................................................................................................... डॉ. कर्मानंद आर्य साहित्य के बिना समाज और समाज के बिना साहित्य की कल्पना असंभव है. समाज एक सामूहिक इकाई है और साहित्य भी बहुत सारी इकाइयों से मिलकर बनता है. यह तथ्य सृजन के हर क्षेत्र में लागू होता है. हिंदी साहित्य का अपना सात-आठ सौ वर्षों का इतिहास है. लेखन की एक बड़ी संख्या में इसमें आमद रही है. साहित्य की बहुत सी विधाओं का अब तक जन्म हो चुका है और कुछ काल के गाल में खुद को समाहित करने से नहीं रोक पायी हैं. प्रतिरोध के साहित्य ने वैसे अनेक मुकाम हासिल किये हैं पर साथ की एक जाति विशेष की कृपा के कारण इस का समुचित विकास नहीं हो पाया. पर इन सात-आठ सौ वर्षों का साहित्य क्या एकान्मुखी नहीं है? साहित्य उन अर्थों में प्रजातान्त्रिक नहीं हो पायी जहाँ उसे समाज के अन्य वर्गों का भी समुचित योगदान प्राप्त होता. होना तो यह चाहिए था कि उसमें सब वर्गों की भागीदारी होती. पर ऐसा हुआ नहीं. ऐसा क्यों नहीं हुआ, क्या साहित्य के बीज में ही क...





















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