संदेश

जेल की खिड़कियाँ

यह घर की कोठरी नहीं है  जेल की खिड़कियाँ हैं भद्दी और खुरदरी  लोहे की हंसुलियाँ  रेत रही हैं गला  अधेड़ उम्र की बंदिनी  अपनी कमीजें फाड़ रही है  नाखूनों और दांतों के जरिये  खून की कुछ बूंदें धरती तक पहुँच रही हैं  बांस के तने पर लगा हुआ खून  टपक रहा है धीरे-धीरे  घुटनों की रोसनाई  अंगूठों तक पहुँच गई है  स्मृतियों में एक बल्ब बुझ गया है  सियाह रात देखकर  अब आदत हो गई है  लहू से लथपथ देहें खास नहीं लगती हैं उसे  बस लिजलिजापन महसूस होता है  अभी उसकी स्मृतियों में है दादी वाला चाँद  कितकित वाली गिट्टी पने वाली रोटियां  वह अपराधी नहीं है  उसने अपराध स्वीकार कर लिया है  जब उसके हाथ सयाने हो जायेंगे  ये खिड़कियाँ अचानक टूट जायेंगी  भरभरा कर गिर पड़ेगी इंटें  सुर्खी-चूना अपने आप अलग हो जायेगा  जब कमीजें फट जायेगी  सच सामने आ जायेगा जगह-जगह घायल देह की किरचें  नंगी आँखों में छुप जाएगी  उसे पुलिस की देहें भी याद नहीं रहेंगी  अंधे जज की बातें भी...
चित्र
चित्र
karmanandarya.blogspot.com

सोनी सोढ़ी के लिए

दो युवतियाँ बिना निशान छोड़े गायब हो गईं हैं  जैसे कश्मीर से गायब हो जाती थीं भेड़ें आक्रोश बढ़ रहा है अपनी बेटियों की हिफाजत के लिए हम तरीके खोज रहे हैं हमारी बेटियां हमारी विरासत हैं हमें अच्छा लगता है जंगल का कानून जो जंगल की हिफाजत के लिए है जंगल में हथियार बंद सिपाही बढ़ते जा रहे हैं हर बार उन्हें लगता है हम गलत हैं हम पराजित हो जायेंगे हम पराजित हो जायेंगे, ख़त्म हो जाएगा हमारा खेल उन्हें लगता है हमारा हौसला टूट रहा है हमारी टुकड़ियों के पास खाने का पैकेट और पानी नहीं है हमारी हिफाजत के लिए हत्या का हथियार लिए वे घूम रहे हैं सबसे चिकनी खालों वाले बिल्ले एक दिन टूटेगा उनका गुमान जब हमारा खून गवाही देगा हम भी लड़ रहे हैं अपने वाजिब हकों के लिए ग्रेहाउंड, कोब्रा, स्कोर्पियन सिपाहियों से मिलती जुलती उन शिकारियों की शक्लें जिनके हाथों में संगीने हैं कभी-कभी बहुत निर्दोष लगते हैं लगता है हममें और उनमें बहुत फर्क नहीं वे हम लोगों की तरह गरीब और सताए हुए लोग हैं वे मजलूम और सताए किसान के बेटे हैं उनका जज्बा यहाँ आकर टूट जाता है जब वे मेरी तरह जि...

चमारी से शादी

एक अज्ञात ख़ुशी की चौंध उठती थी मेरे भीतर तो फूट जाते पीले-पीले लड्डू हरी हल्दी का रंग और गाढ़ा हो जाता थिर मछरी की आँख देखना बंद कर देती   हंस की गर्दन उठा जब भागती हवा, तो खिसिया जाता कोरा मन    हरियायी नीम पर फुदक उठता निहुरा आसमान नदी को चिढ़ाता हुआ   ठीक उसी समय माँ उछालती मेरी शादी का जुमला थरथराती भावनाओं के पास आकर बैठा जाता मन जब उड़ती कोई चिड़िया  माँ का उलाहना सपने में तब्दील हो जाता किसी सफ़ेद घोड़े पर सवार हुआ मैं अपने सहबाला से पूंछता दुल्हन की बातें उसकी सहेलियों की ठिठोली से भर लेता अंकवार दिन बीत गए माँ की ठिठोली याद आती है करवा दूँ किसी चमारी से शादी आज सोचता हूँ क्या माँ मेरे भीतर घृणा पैदा करती थी? माँ घृणा नहीं बो सकती! शादी के सपने दिखा सकती है   वे बचपन के दिन थे बीतने का नाम ही नहीं लेते

रस्सी सुलग रही है

रस्सी सुलग रही है हिंसा की भूमि में, अहिंसा का तांडव क्यों बरगला रहे हो बुद्ध! आओ देखो पटना के दलित होस्टल में तुम पिट रहे हो, पीट रहे हैं तुम्हारे अनुयायी लोमड़ियाँ सिर खुजा रही हैं सत्ता की बिल्लियाँ हाथों में हथियार लिए घूम रहीं है उनके नुकीले हथियार व्यर्थ हो गए हैं उनसे चूहों का शोषण किया जा सकता है उनसे क्रांति नहीं लायी जा सकती है क्या तुम्हारा धर्म हिंसक दैत्यों का रक्षक था तुमने अहिंसा की चादर डाल उन्हें बचा लिया तुम्हारा अनुन्यायी राजा तुम्हारा सम्मान करता था अतः उसने तुम्हारा भव्य महोत्सव मनाया पटना के पास इलाके में सज गया है तुम्हारा मंदिर आओ देखो ! पिटने के बाद करुणा कैसे पैदा होती है आओ देखो युद्धक शांति का सुख महामहिम! जल्दी आना बची हुई रस्सी सुलग रही है तुम्हें शांति का नोबेल मिल सकता है! डॉ.कर्मानंद आर्य  
चित्र
क्या आप मनोरंजन ब्यापारी को जानते हैं “मैं एक दलित लेखक हूँ. मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं हत्याएं नहीं कर सकता. यदि मुझे हत्या का अधिकार हो तो लिखना छोड़ दूँ.” इससे पहले हमने कभी नहीं सुना, देखा, जाना था उनका नाम. पर वे सच में जादूगर हैं. वे किसी उपन्यास के नायक से कम नहीं हैं. उनकी बांग्ला मिश्रित हिंदी ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. अवसर था प्रथम  “पटना लिटरेचर फेस्टिवल” का उन्हें सुना तो फिर उठने का मन नहीं हुआ. वैसे वे एक दलित लेखक के प्रतिनिधि के तौर पर वहाँ आमंत्रित  थे. जब उनका परिचय दलित साहित्य के उन्नायक डॉ.बजरंग बिहारी तिवारी जी ने कराया तो लगा उन्होंने हीरा खोज लिया है. उनकी खोजी वृत्ति ने हम हिंदी वालों का बहुत उपकार किया. कथादेश में बजरंग बिहारी तिवारी ने उस ‘ दलित ’ लेखक के ऊपर पहले एक बहुत सुंदर लेख लिखा था. यह हम हिंदी वालों से उस बांग्ला लेखक का पहला परिचय , जिसका जीवन ही साहित्य है. स्वाध्याय से शिक्षा अर्जित करने वाले मनोरंजन ब्यापारी रिक्शा चलाते थे , कि वे एक स्कूल में ...