संदेश

बलात्कार का रूपक

हर चौराहे, नुक्कड़, स्कूल, थाने हर गुजरती ट्रेन के दरवाजे पर मैंने एक जिन्दा लाश टांग दी है मेरे प्रिय नेता के पोस्टर से ज्यादा खूबसूरत इस पोस्टर में लिखा है ‘ मेरी आवाज मेरी स्कर्ट से ऊंची है ’ उनके सब्र  और गुस्से  के प्याले से बाहर रक्खी हुई उनकी आँख से कहो आयें घूरें मेरा जिस्म मुझे विधानपरिषद भवन में नहीं अपने पर्सनल कंप्यूटर में देखें वह भी देखें जो मेरी चमड़ी के भीतर लाल कत्था है यदि उ ला ला................ के गीत ख़त्म हो गए हों तो निहारे अपनी कुंठा देखे मेरी लिपस्टिक, मेरी कमर की गोलाई नापें हरियाणा में दलित बच्चियों पर हुए सामूहिक बलात्कार सोनी सोरी का पुलिस उत्पीड़न न सुनें यह भी न सुनें उसे  नंगा करके जमीन पर बैठाया जाता है उसे  भूख से पीडि़त किया जा ता  है     उसके  अंगों को छूकर तलाशी किया जाता है उसका आर्त्तनाद न सुनें मैं एक भारतीय आदिवासी महिला हूं विधि संहिता में मेरा वस्त्र उतारा जाना जायज है पर बताया जाय मैं कब तक नुक्कड़ पर नंगी खड़ी रहूँ सेंट्रल जेल के सिप...

मेरे हाथ !

मेरे हाथ ! तानाशाह मुझे रौंदने की जुर्रत मत करना  दो हाथों के अलावा उग आये हैं  मेरे और कई हाथ  मेरे हाथों में आज कलम है, तलवार है  तराजू है, ताबूत की कुछ कीलें  हम मुग़ल नहीं, तलवारों वाले बौद्ध हैं  हम अहिंसा का मतलब समझ गए हैं  पकड़ ली गई है तुम्हारी साजिस  अगली बरसात से पहले  बरसेंगे हमारे हाथ  मशाल की तरह जलेंगी हमारी भुजाएं  खेत, खलिहान, गलियों में  जब वे फैले होंगे  एक सूरज का गला पकड़ बाहर खींच लायेंगे हम एक सामानांतर सूर्य चाहते हैं  वह सूर्य जिसे तुम्हारे मुकुट ने गन्दा कर दिया है  हम अगली साँस तब लेंगे  जब टूट जाएगा तुम्हारा भ्रम तुम बहुत बड़े हो हम जनेऊ की गाँठ खोलने आये हैं  आसमान से बहुत ऊँची चोटी पर तांडव करने  जब टूट जायेगी ये चट्टानें  और तुम उन चट्टानों में दफ्न हो जाओगे  हम जश्न नहीं मनाएंगे  हम तुम्हारी अस्थियों का चूरमा बनायेंगे  हम अपनी हार का बदला लेंगे  रक्त प्लावित मेरा चेहरा बस तुम्हें देखना चाहता है  हमें ठीक हो जाना है अपनी कमजोरियां ठीक कर...

जेल की खिड़कियाँ

यह घर की कोठरी नहीं है  जेल की खिड़कियाँ हैं भद्दी और खुरदरी  लोहे की हंसुलियाँ  रेत रही हैं गला  अधेड़ उम्र की बंदिनी  अपनी कमीजें फाड़ रही है  नाखूनों और दांतों के जरिये  खून की कुछ बूंदें धरती तक पहुँच रही हैं  बांस के तने पर लगा हुआ खून  टपक रहा है धीरे-धीरे  घुटनों की रोसनाई  अंगूठों तक पहुँच गई है  स्मृतियों में एक बल्ब बुझ गया है  सियाह रात देखकर  अब आदत हो गई है  लहू से लथपथ देहें खास नहीं लगती हैं उसे  बस लिजलिजापन महसूस होता है  अभी उसकी स्मृतियों में है दादी वाला चाँद  कितकित वाली गिट्टी पने वाली रोटियां  वह अपराधी नहीं है  उसने अपराध स्वीकार कर लिया है  जब उसके हाथ सयाने हो जायेंगे  ये खिड़कियाँ अचानक टूट जायेंगी  भरभरा कर गिर पड़ेगी इंटें  सुर्खी-चूना अपने आप अलग हो जायेगा  जब कमीजें फट जायेगी  सच सामने आ जायेगा जगह-जगह घायल देह की किरचें  नंगी आँखों में छुप जाएगी  उसे पुलिस की देहें भी याद नहीं रहेंगी  अंधे जज की बातें भी...
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सोनी सोढ़ी के लिए

दो युवतियाँ बिना निशान छोड़े गायब हो गईं हैं  जैसे कश्मीर से गायब हो जाती थीं भेड़ें आक्रोश बढ़ रहा है अपनी बेटियों की हिफाजत के लिए हम तरीके खोज रहे हैं हमारी बेटियां हमारी विरासत हैं हमें अच्छा लगता है जंगल का कानून जो जंगल की हिफाजत के लिए है जंगल में हथियार बंद सिपाही बढ़ते जा रहे हैं हर बार उन्हें लगता है हम गलत हैं हम पराजित हो जायेंगे हम पराजित हो जायेंगे, ख़त्म हो जाएगा हमारा खेल उन्हें लगता है हमारा हौसला टूट रहा है हमारी टुकड़ियों के पास खाने का पैकेट और पानी नहीं है हमारी हिफाजत के लिए हत्या का हथियार लिए वे घूम रहे हैं सबसे चिकनी खालों वाले बिल्ले एक दिन टूटेगा उनका गुमान जब हमारा खून गवाही देगा हम भी लड़ रहे हैं अपने वाजिब हकों के लिए ग्रेहाउंड, कोब्रा, स्कोर्पियन सिपाहियों से मिलती जुलती उन शिकारियों की शक्लें जिनके हाथों में संगीने हैं कभी-कभी बहुत निर्दोष लगते हैं लगता है हममें और उनमें बहुत फर्क नहीं वे हम लोगों की तरह गरीब और सताए हुए लोग हैं वे मजलूम और सताए किसान के बेटे हैं उनका जज्बा यहाँ आकर टूट जाता है जब वे मेरी तरह जि...

चमारी से शादी

एक अज्ञात ख़ुशी की चौंध उठती थी मेरे भीतर तो फूट जाते पीले-पीले लड्डू हरी हल्दी का रंग और गाढ़ा हो जाता थिर मछरी की आँख देखना बंद कर देती   हंस की गर्दन उठा जब भागती हवा, तो खिसिया जाता कोरा मन    हरियायी नीम पर फुदक उठता निहुरा आसमान नदी को चिढ़ाता हुआ   ठीक उसी समय माँ उछालती मेरी शादी का जुमला थरथराती भावनाओं के पास आकर बैठा जाता मन जब उड़ती कोई चिड़िया  माँ का उलाहना सपने में तब्दील हो जाता किसी सफ़ेद घोड़े पर सवार हुआ मैं अपने सहबाला से पूंछता दुल्हन की बातें उसकी सहेलियों की ठिठोली से भर लेता अंकवार दिन बीत गए माँ की ठिठोली याद आती है करवा दूँ किसी चमारी से शादी आज सोचता हूँ क्या माँ मेरे भीतर घृणा पैदा करती थी? माँ घृणा नहीं बो सकती! शादी के सपने दिखा सकती है   वे बचपन के दिन थे बीतने का नाम ही नहीं लेते