मुसाफ़िर बैठा की कवितायें :

मुसाफ़िर बैठा : चर्चित दलित लेखक. एक काव्य संग्रह प्रकाशित. एक काव्य संग्रह , एक अनुवाद पुस्तक एवं एक आलोचना पुस्तक प्रकाशन की प्रक्रिया में है.बिहार विधान परिषद् के प्रकाशन विभाग में कार्यरत. ‘ मुसाफिर बैठा ’ बिलकुल अलग मिज़ाज के कवि है. वे चर्चित दलित लेखक हैं. ’ बीमार मानस का गेह ’ नामक उनका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है. वे बिहार में दलित अस्मिता और बेबाकी से अपनी बात रखने वाले कबीरी परम्परा के एक मात्र कवि हैं. अभी हाल में ही उन्होंने ‘ बिहार-झारखण्ड : चुनिन्दा दलित कवितायें ’ नामक सग्रह के सम्पादन का कार्य करके अपनी मेधा का परिचय दिया है. ना मर्द बनने का अभ्यास आज पहली बार मैंने घर-भर के सारे काम किये चूल्हा चौका किया बर्तन-बासन मांजा खुद ही अपना खाना लगाया बीवी बच्चों का भी पत्तल सजाया झाड़ू पोंछा लगाया मर्द हाथों से बार बार अपने रुग्णदेह संगिनी के पाँव दबाया घर में मालिक होते हैं हम मर्द और , घर के काम की मालिक औरतें मजबूरन , घर को स्त्री-भर संभाला कुछ ना मर्द बनने का कुछ कुछ अभ्...